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Akhilesh-Maya’s press conference today | अखिलेश-माया की प्रेस कॉन्फ्रेंस आज, गठबंधन से 60 सीटों पर भाजपा की राह मुश्किल होगी

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  • सपा-बसपा के बीच 26 साल बाद गठबंधन हो रहा
  • 1993 से 1995 तक उप्र में दोनों दलों की गठबंधन सरकार थी
  • उप्र में 80 लोकसभा सीटें, सपा-बसपा 37-37 सीटों पर चुनाव लड़ सकती हैं

Dainik Bhaskar

Jan 12, 2019, 06:28 AM IST

लखनऊ. समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव और बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती आज पहली बार संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस करेंगे। इसमें लोकसभा चुनाव में गठबंधन की घोषणा होगी। दोनों दल 37-37 सीटों पर चुनाव लड़ सकते हैं। 26 साल बाद सपा-बसपा में गठबंधन हो रहा है। इससे पहले 1993 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में सपा-बसपा का गठबंधन हुआ था।

 

सपा-बसपा के गठबंधन में अगर कांग्रेस, रालोद भी शामिल होते हैं तो उत्तर प्रदेश में 60 लोकसभा सीटों पर भाजपा की राह मुश्किल हो सकती है। 37-37 सीटों पर सपा-बसपा के लड़ने की स्थिति में 6 सीटें सहयोगी दलों को दी जाएंगी। 

 

रालोद को तीन सीटें मिल सकती हैं 

कहा जा रहा है कि तीन सीटें रालोद और दो सीटें कांग्रेस को दी जा सकती हैं। एक सीट अन्य सहयोगी के लिए रखी जा सकती है। सीटों के बंटवारे में पेंच रालोद की वजह से फंस गया है। पार्टी प्रमुख अजीत सिंह चार सीटों चाहते हैं। पिछले शुक्रवार को अखिलेश और मायावती के बीच दिल्ली में बैठक हुई थी। इसमें यह बात भी निकलकर आई थी कि दोनों कांग्रेस के साथ चुनाव लड़ने के पक्ष में नहीं हैं।

 

पहले भी साथ आए थे बसपा-सपा

मुलायम सिंह यादव ने 1992 में समाजवादी पार्टी का गठन किया था। 1993 में हुए विधानसभा चुनाव में सपा-बसपा का गठबंधन हुआ। उस समय बसपा की कमान कांशीराम के पास थी। सपा 256 और बसपा 164 विधानभा सीटों पर चुनाव लड़ी। सपा को 109 और बसपा को 67 सीटें मिलीं। लेकिन 1995 में सपा-बसपा के रिश्ते खराब हो गए। इसी समय 2 जून 1995 को गेस्ट हाउस कांड के बाद गठबंधन टूट गया। 

 

मुलायम

 

क्या था गेस्ट हाउस कांड?

कहा जाता है कि 1993 में मुलायम सिंह के मुख्यमंत्री बनने के बाद बसपा और भाजपा के बीच नजदीकियां बढ़ने लगी थीं। सपा को इसका अंदेशा हो गया था कि बसपा कभी भी सरकार से समर्थन वापस ले सकती है। 2 जून 1995 को मायावती अपने विधायकों के साथ स्टेट गेस्ट हाउस में बैठक कर रही थीं। इसकी जानकारी जब सपा के लोगों को हुई तो उसके कई समर्थक वहां पहुंच गए। सपा समर्थकों ने वहां जमकर हंगामा किया। बसपा विधायकों से मारपीट तक की गई। मायावती ने इस पूरे ड्रामे को अपनी हत्या की साजिश बताया और मुलायम सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया। मुलायम सरकार के अल्पमत में आते ही भाजपा ने बसपा को समर्थन देने का पत्र राज्यपाल को सौंप दिया। अगले ही दिन मायावती राज्य की पहली दलित मुख्यमंत्री बन गईं।

 

उदाहरण से समझिए सपा-बसपा के गठबंधन से कैसे पलट सकते हैं नतीजे

 

  • 2014 में वरुण गांधी 410,348 वोट पाकर सुल्तानपुर सीट से जीते। बसपा के पवन पांडे को 2,31,446 वोट जबकि सपा के शकील अहमद को 2,28,144 वोट मिले। अगर 2019 में दूसरे नंबर पर रही बसपा अपना उम्मीदवार उतारती है और सपा के वोट बसपा उम्मीदवार को ट्रांसफर हो जाते हैं तो वोटों का आंकड़ा 4,59,590 हो सकता है। यह वरुण गांधी को मिले वोटों से ज्यादा होगा।
  • सुल्तानपुर में कांग्रेस की अमिता सिंह 41,983 वोट पाकर चौथे नंबर पर रही थीं। उनके वोट जोड़ने पर विपक्ष का आंकड़ा 5 लाख से ज्यादा पहुंच सकता है।
  • मिर्जापुर से जीतीं केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल को भी 2014 में सपा-बसपा और कांग्रेस को मिले कुल वोट से कम वोट मिले थे।

 

उत्तरप्रदेश: 2014 के लोकसभा चुनाव की स्थिति

कुल सीटें: 80 

 






पार्टी सीटें वोट शेयर
भाजपा+ 73 42.6%
सपा 05 22.3%
बसपा 00 19.8%
कांग्रेस 02 7.5%

 

2018 में भाजपा को सपा-बसपा से हुआ नुकसान

गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव में बसपा ने सपा उम्मीदवार को वोट देने की अपील की थी। वहीं, कैराना लोकसभा उपचुनाव में रालोद उम्मीदवार को सपा-बसपा और कांग्रेस ने समर्थन दिया। तीनों जगहों पर भाजपा को हार मिली थी।





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