बॉलीवुड में असरदार नहीं रहा किकेट का जादू, क्लीन-बोल्ड हुई ये फ़िल्में | Bollywood films around cricket flopped trivia around world cup ssm

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क्रिकेट और बॉलीवुड का आपस में बहुत गहरा और पुराना रिश्ता है. क्रिकेटर्स बॉलीवुड में आते रहे हैं मसलन संदीप पाटिल, विनोद कांबली, अजय जडेजा जैसे सितारे. वहीं बॉलीवुड की डीवाज़ के साथ कई क्रिकेट खिलाड़ियों ने शादी की है जैसे नवाब मंसूर अली खान पटौदी, मोहम्मद अज़हरुद्दीन, युवराज सिंह,  हरभजन सिंह और हाल के दिनों में विराट कोहली. लेकिन क्रिकेट और सिनेमा का इतना गहरा रिश्ता होने के बाद भी क्रिकेट पर बनने वाली फिल्मों का बॉक्स ऑफिस पर हाल अच्छा नहीं रहा है.

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विश्व कप के दौरान किसी ने चर्चा छेड़ी कि भारत में क्रिकेट जितनी खेली जाती है उतनी इस विषय पर फिल्में नहीं बनती. मसलन, हिंदी सिनेमा में भूत प्रेत पर बनी फिल्मों की संख्या क्रिकेट पर बनी फिल्मों की संख्या से कई गुना ज्यादा है. इसका एक सीधा कारण है क्रिकेट के इर्द गिर्द बनी फिल्मों का बॉक्स ऑफिस पर खराब प्रदर्शन. अगर ‘लगान’, ‘पटियाला हाउस’, और ‘एम एस धोनी’ को छोड़ दिया जाए तो क्रिकेट पर बनी अधिकांश फिल्मों का हाल बॉक्स ऑफिस पर कुछ खास अच्छा नहीं रहा. ‘इकबाल’ को चर्चा बहुत मिली लेकिन इस फिल्म को यहां तक की क्रिकेट के भगवान माने जाने वाले सचिन तेंदुलकर की बायोपिक को भी मुनाफा कमाने के डिजिटल राइट्स का सहारा लेना पड़ा था.

इस बॉलीवुड एक्टर की नज़र में ‘भारत’ सलमान खान की सबसे घटिया फिल्मधीरे धीरे निर्माताओं ने मान लिया कि क्रिकेट की थीम पर सिनेमा बनाना फायदे का सौदा नहीं है. लेकिन इन फिल्मों पर अगर आप गौर करें तो इनके फ्लॉप होने का कारण इनको बनाने से लेकर इनकी स्टार कास्ट तक को माना जा सकता है. जिन फिल्मों में क्रिकेट को सही तरीके से दिखाया गया है उन फिल्मों को सराहना भी मिली है. वर्ना अधिकांश क्रिकेट फिल्मों में क्रिकेट को कहीं पृष्ठभूमि में डाल दिया गया है.

बॉलीवुड में क्रिकेट फिल्मों के इतिहास पर नज़र डालें तो सामने आता है कि क्रिकेट पर बनी इन चंद फिल्मों के साथ कभी तो दुर्भाग्य रहा और कभी बजट या सितारों की कमी. विश्व कप के दौरान इन फिल्मों की चर्चा पर है इस बार का डिजिटल प्राइम टाइम.

80 का दशक – पहली क्रिकेट फिल्म!80 के दशक में पूरी तरह से क्रिकेट पर बनी पहली फिल्म थी ‘आल राउंडर’ (1984). इस फिल्म को भारतीय क्रिकेट टीम की ऐतिहासिक विश्व कप जीत के बाद बनाया गया था और 80 के दशक में अचानक राइज़ करने वाले हीरो कुमार गौरव इस फिल्म के लीड थे.

इस फिल्म में निर्देशक क्रिकेट और एक भावुक कहानी को मिक्स करना चाहते थे. एक उम्दा खिलाड़ी, उस पर लगा बैन, परिवार से लड़ाई, इस फिल्म में क्रिकेट और इससे जुड़े सारे मसाले थे लेकिन फिल्म चल नहीं सकी. इसका एक बड़ा कारण था फिल्म के गानों का हिट नहीं होना. फिल्म ऐसे समय में रिलीज़ हुई थी जब संगीत को फिल्म हिट करवाने का ज़रिया माना जाता था.

भारत ने 1983 का विश्व कप जीता था और इस फिल्म को इसी जीत को भुनाने के लिए बनाया गया था लेकिन कुमार गौरव के गिरते करियर को बचाने में इस फिल्म को कोई सफलता नहीं मिली.

90 का दशक – ‘ख़ान’ मैजिक!
इस फिल्म के 6 साल बाद क्रिकेट पर फिल्म बनाने का आइडिया आया एवरग्रीन हीरो देव आनंद को. अव्वल नंबर (1990) फिल्म के साथ वो एक बड़ी क्रिकेट फिल्म लोगों के सामने लाए. आमिर खान ने इस फिल्म में पहली बार क्रिकेटर का रोल निभाया था.

लेकिन देव आनंद की इस फिल्म का भी बॉक्स ऑफिस पर बुरा हाल रहा. इसका सबसे बड़ा कारण था 67 साल के देव आनंद, जो इस फिल्म के हीरो खुद थे.

वो आमिर खान और आदित्य पांचोली के फिल्म में होते हुए भी अधिकांश दृश्यों में नज़र आते हैं. इस फिल्म में क्रिकेट से ज्यादा रंजिश और आतंकवादी साजिश को दिखाया गया था और ज़ाहिर है कि क्रिकेट प्रेमियों का दिल इस फिल्म ने नहीं लुभाया. इस फिल्म की वजह से सालों तक आमिर खान क्रिकेट फिल्मों से दूर ही रहे.

चमत्कार (1992)
आमिर की फिल्म तो फ्लॉप रही लेकिन 90 के दशक में ही दूसरे खान शाहरुख खान और उर्मिला मातोंडकर की फिल्म ‘चमत्कार’ को हिट का दर्जा मिला. बस कमी ये थी कि क्रिकेट इस फिल्म की थीम नहीं था.

ये एक हल्की फुल्की कॉमेडी-एक्शन फिल्म थी जिसकी पृष्ठभूमि में एक क्रिकेट कोच को रखा गया था. नसीरुद्दीन इस फिल्म में पहले डॉन और फिर एक भूत के रोल में नज़र आते हैं. फिल्म के गाने भी हिट हुए और ज़ाहिर है कि फिल्म से शाहरुख के करियर को फायदा मिला.

2000 का दशक – क्रिकेट की वापसी!
चमत्कार और अव्वल नंबर जैसी फिल्मों के औसत प्रदर्शन और उधर टीम इंडिया की ठीक ठाक परफॉर्मेंस ने निर्माताओं को क्रिकेट फिल्मों से दूर ही रखा. लेकिन साल 2000 आते आते देश पर क्रिकेट का बुखार चढ़ने लगा था. देश में सचिन जैसे हीरो का उदय हो चुका था और गली गली में क्रिकेट ने अपने पैर पसार लिए थे. ऐसे में सिनेमा निर्माताओं के लिए इसे दरकिनार करना संभव नहीं था. क्रिकेट पर नई फिल्में आईं और एक फिल्म ने इतिहास भी रचा.

लगान (2001)
आमिर ने जब पहली बार क्रिकेटर का रोल निभाया था (अव्वल नंबर) तो वो खासा असफल हुए थे. उनकी फिल्म को न प्रशंसा मिली थी न ही दर्शक. लेकिन आमिर की फिल्म लगान ने सफलता के सभी मानकों को तोड़ कर रख दिया.

एक छोटे से गांव की टीम ने जब अंग्रेज़ी हुकुमत को उन्हीं के खेल क्रिकेट में परास्त किया तो सिनेमा में बैठे लोगों को महसूस हुआ जैसे भारत जीता हो. निर्देशक आशुतोष गोवारिकर ने दर्शकों की नब्ज़ पकड़ ली थी. असल ज़िंदगी में भारतीय क्रिकेट टीम विदेशी धरती पर लचर प्रदर्शन कर रही थी. इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया जैसी टीमों को हराना भारत के लिए मुश्किल हो जाता था. ऐसे में जब भुवन (आमिर खान) का किरदार आखिरी बॉल पर छक्का जड़कर पिच पर खड़ा रह जाता है तो हॉल में बैठे दर्शकों की चीख निकल जाती है.

इस फिल्म को भारत की ओर से ऑस्कर में भेजा गया था और फिल्म को बेस्ट फॉरेन फिल्म का नॉमिनेशन भी मिला था. आमिर-आशुतोष इस फिल्म से ऑस्कर तो नहीं ला पाए लेकिन भारत में आमिर खान सबसे बड़े सितारे का दर्जा पा चुके थे और इस काम में एक क्रिकेट फिल्म का हाथ था.

फिल्मों की बाढ़ और फिक्सिंग
लगान की सफलता के बाद क्रिकेट फिल्मों की बाढ़ सी आई. ‘स्टंप्ड’ (2003), ‘इकबाल’ (2005), ‘हैटट्रिक’ और ‘चेन कुली की मेन कुली’ (2007), ‘मीराबाई नॉट आउट’ (2008) जैसी फिल्मों ने क्रिकेट को भुनाने की कोशिश की. इन फिल्मों में कपिल देव, सचिन और सुनील गावस्कर जैसे खिलाड़ियों ने छोटे कैमियो भी किए लेकिन इन फिल्मों में से ‘इकबाल’ को छोड़कर कोई भी फिल्म अपना प्रभाव नहीं छोड़ पाती है.

इसका बड़ा कारण था इन फिल्मों की एक जैसी कहानी, छोटे स्टार्स और एक के बाद एक क्रिकेट पर आ रही फिल्मों की बाढ़. इन फिल्मों में कॉमेडी और क्रिकेट को मिलाने की कोशिश की गई थी लेकिन सभी फिल्में जब एक जैसी लगने लगीं तो दर्शक भी इनसे उबने लगे.

साल 2006 – 07 के बाद भारतीय क्रिकेट पर लगे फिक्सिंग के धब्बे ने क्रिकेट से लोगों का भरोसा भी उठाया. इसके बाद सिनेमा के पर्दे पर क्रिकेट को अलग अंदाज़ में दिखाया जाने लगा. ‘जन्नत’ (2008), ‘99’ (2009) जैसी फिल्मों ने सट्टेबाज़ी और इसमें खिलाड़ियों की फंसने की कहानी को दिखाया गया था. इमरान हाशमी की फिल्म जन्नत को लेकर कई लोगों ने आपत्ति भी जताई थी लेकिन भारतीय क्रिकेट उस समय एक ऐसे दौर से गुज़र रहा था जो इस फिल्म से कहीं ज्यादा बुरा था.

2010 का दशक – क्रिकेट की वापसी!
दो से तीन सालों तक क्रिकेट से फैन्स की नाराज़गी जारी रही लेकिन 2007 के टी 20 विश्व कप में भारत की विजय ने हालात बदल दिए. इसके बाद 2011 में भारतीय टीम से फैन्स को उम्मीद थी और वो उम्मीद पर खरे उतरे. भारत चैंपियन बना, फैन्स लौट आए और फिर फिल्मों में भी क्रिकेट की वापसी हुई.

अक्षय कुमार की फिल्म पटियाला हाउस को साल 2011 में रिलीज़ किया गया था और अक्षय के नाम और भारतीय टीम के कमाल के प्रदर्शन का फायदा इस फिल्म को मिलना चाहिए था. लेकिन इस फिल्म ने उम्मीद से कम कमाई की. 21 करोड़ के बजट में बनी इस फिल्म ने 35 करोड़ का ही कारोबार किया. इन दिनों विराट कोहली की पत्नी अनुष्का शर्मा इस फिल्म में एक क्रिकेटर (अक्षय कुमार) के प्यार में पड़ जाती हैं. तब अनुष्का को इस बात का अंदाज़ा भी नहीं रहा होगा कि वो क्रिकेट से इतना गहरा संबंध बना लेंगी.

क्रिकेट ने भले ही देश में वापसी की थी और भारत को उसका नया हीरो एम एस धोनी मिल गया था, लेकिन क्रिकेट फिल्में फायदे का सौदा साबित नहीं हो पा रही थीं. ऐसे में ‘फरारी की सवारी’ के बाद कोई बड़ी क्रिकेट फिल्म रिलीज़ नहीं हुई. क्रिकेट फिल्मों के नाम पर बॉलीवुड में एक खामोशी थी, तूफान से पहले की खामोशी.

बायोपिक का दौर
बॉलीवुड ने क्रिकेट को सिनेमा के पर्दे पर हमेशा एक कहानी की तरह परोसा था. एक काल्पनिक हीरो जो क्रिकेट स्टार बन जाता है या एक क्रिकेट को प्यार करने वाली फैमिली जो अपने रिश्तों को क्रिकेट से जोड़ती है. लेकिन किसी क्रिकेटर की असली कहानी तो पर्दे पर कभी नहीं आई थी.

एम एस धोनी की बायोपिक ने इस पूरे इतिहास को बदल कर रख दिया. इस फिल्म में सुशांत सिंह राजपूत जैसा एक नया अभिनेता था तो इस फिल्म की कोई बड़ी स्टार वैल्यू नहीं थी. लेकिन धोनी खेल के लीजेंड बन चुके हैं. भारत को दो विश्व कप जिताने वाले सफलतम कप्तान को लोग सम्मान की दृष्टि से देखते हैं ऐसे में इस इंसान की कहानी को देखने के लिए लोगों का हुजूम सिनेमाघरों में उमड़ा.

नीरज पांडे की इस फिल्म ने 216 करोड़ का कारोबार किया था और सुशांत सिंह राजपूत को भी बॉलीवुड के 100 करोड़ कमाने वाले सितारों की लिस्ट में लाकर खड़ा कर दिया था. इस फिल्म की सफलता के बाद ही सचिन तेंदुलकर की किताब को एक फिल्मनुमा डॉक्यूमेंट्री ‘सचिन – ए बिलियन ड्रीम्ज़’ की शक्ल दी गई. ‘एम एस धोनी – दि अनटोल्ड स्टोरी’ ने ये साबित किया की क्रिकेट बायोपिक भी सुपरहिट हो सकते हैं, बशर्ते उन्हें बेहतरीन तरीके से बनाया जाए.

क्रिकेट बायोपिक के तौर पर एकता कपूर ‘अज़हर’ भी लेकर आई थीं लेकिन निर्देशक टोनी डिसूज़ा ने ये फिल्म इतनी खराब और एकतरफा बनाई थी की फिल्म को सभी तरफ से आलोचना झेलनी पड़ी. इस फिल्म को अज़हर की छवि को ठीक करने की कोशिश के तौर पर देखा जाता है. फिल्म से कई पुराने खिलाड़ियों को दिक्कत भी थी और ये फिल्म सत्य घटनाओं से काफी दूर भी लगती है.

लेकिन किसी एक या दो फिल्मों की कमाई पर ये कहना कि क्रिकेट पर बनी फिल्में बॉलीवुड के लिए फायदे का सौदा हैं, सही नहीं होगा. क्रिकेट पर फिल्म बनाना काफी खर्चे का काम होता है. कई मैदानों में शूट करने की इजाज़त, कपड़े और क्रिकेट के सामान का इंतज़ाम, अंतर्राष्ट्रीय कलाकारों या खिलाड़ियों को बुलाना.

क्रिकेट पर बनी किसी भी फिल्म की लागत करोड़ों में आती है और इतिहास यही है कि लगान, इकबाल, एम एस धोनी और पटियाला हाउस को छोड़कर क्रिकेट पर बनी किसी भी फीचर फिल्म ने सिनेमाघरों की कमाई से अपनी लागत नहीं वसूली. ऐसे में ये एक घाटे का सौदा है और निर्माताओं को अब ये भी पता है कि क्रिकेट पर बनी कहानी से ज्यादा लोग क्रिकेटर पर बनी कहानी देखना पसंद करते हैं. इसलिए अगली क्रिकेट फिल्म शायद युवराज या गांगुली की बायोपिक के तौर पर ही आएगी.

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