क्या आपका बच्चा भी नींद में ही रोने लगता है? | New study says that it’s okay to let babies cry at night

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6 से 16 माह के बच्चों को शोध में किया शामिल

6 से 16 माह के बच्चों को शोध में किया शामिल

शोधकर्ताओं ने ऐसे 6 से 16 माह के बच्चों को शामिल किया जिन्हें रात को सोने में दिक्कत आती थी। इन्हें तीन हिस्सों में बांटा गया। एक समूह में माता पिता ने अपने बच्चों के रोने पर तुरंत प्रतिक्रिया नहीं की। इसके बजाय बच्चे को सहज होने के लिए समय दिया। इस दौरान उन्होंने ना तो बच्चे को गोद लिया और ना ही कमरे की लाइट जलाई। इसके बावजूद अगर बच्चा रोता है तो अभिभावक तब तक इंतजार करते हैं जब तक कि बच्चा सो नहीं जाता।

जबकि दूसरे समूह में माता पिता से कहा गया कि अगर बच्चे को रात में सुलाने में समस्या हुई तो अगली रात से उन्हें देर से सुलाएं। तीसरे और आखिरी समूह ने नियंत्रण समूह के रूप में काम किया, जहां उन्हें किसी बच्चे को सुलाने से संबंधित किसी तरह के कोई निर्देश नहीं दिए गए थे। मतलब यह कि उन्होंने अपनी मर्जी के अनुसार बच्चे को सुलाने की कोशिश की।

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बच्चों की लार से पता किया गया स्ट्रेस लेवल

बच्चों की लार से पता किया गया स्ट्रेस लेवल

पहले दो तरीकों में अपवाद है क्योंकि बच्चे का बहुत जोर-जोर से रोना बच्चे और पैरेंट्स, दोनों के लिए तनावपूर्ण होता है। दरअसल रोने से बच्चे में स्ट्रेस हार्मोन कार्टिसोल का स्तर बढ़ जाता है। शोधकर्ता बच्चे की लार से स्ट्रेस हार्मोन के स्तर का विश्लेषण करते हैं। इसके लिए रूई की फाहों की मदद लेते हैं। नमूने दिन में और सुबह के समय लिए गए थे।

बच्चों में तनाव?

बच्चों में तनाव?

तीन महीने के समय अंतराल और पहले समूह के 14 बच्चों पर हुए अध्ययन से पता चला कि जिन बच्चों को रोता हुआ छोड दिया गया ओर दूसरे समूह के 15 बच्चों को अगली रात देर से सुलाया गया, वे तीसरे समूह के बच्चे की तुलना में जल्दी सो गए। जबकि पहले समूह के बच्चे तीसरे समूह के बच्चों की तुलना में कम बार जगे।

परिणाम यह भी बताते हैं कि दोपहर के समय दो समूह के बच्चों में कार्टिसोल स्तर नियंत्रित था जबकि तीसरे समूह के बच्चों में कार्टिसोल का स्तर बढ़ा हुआ था। इसका मतलब यह हुआ कि वे कम तनाव में थे।

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अध्ययन से निकला ये निष्कर्ष

अध्ययन से निकला ये निष्कर्ष

शोधकर्ताओं का मानना है कि संभवतः ये तरीके बच्चों को सुलाने और उनकी जिंदगी को सहज करने में उपयोगी साबित हों। वे रोना बंद कर दें और समय पर सो जाएं। इस प्रक्रिया के एक साल बाद माओं ने बच्चों के भावनात्मक और व्यवहार से संबंधित समस्याओं पर बात की। पता चला कि ये बच्चे काफी खुश थे। इनके स्वभाव में किसी भी तरह की नकारात्मक बातें शामिल नहीं थीं। अध्ययन में तीनों समूह में मौजूद मांओं के मूड का भी विश्लेषण किया गया। पता चला कि मांओं का मूड बेहतर हुआ। लेकिन यह बेहतरी उस समूह में ज्यादा दिखी जिन्हें नींद की समस्या नहीं थी।





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